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संपादकीय…..आम चुनाव की झलक! – Vishleshan

संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। इसे गिरना ही था। गिर गया। अब समीक्षाओं और विश्लेषणों का दौर चल रहा है। मुख्य मुद्दा मणिपुर का था, विपक्ष ने मणिपुर के साथ ही और मुद्दे भी उठाने का प्रयास किया तो सत्तापक्ष की तरफ से मणिपुर छोड़, बाकी पिछले इतिहास पर ज्यादा जोर दिया गया। और अंत में ऐसा लगा मानो यह जंग मोदी बनाम राहुल हो गई। परिणाम न कुछ आना था, न आया। हां, एक झलक उस आने वाले आम चुनाव की अवश्य देखने को मिल गई, जो अगले साल होना है। उसकी तैयारी का खाका इस बहस से आप खींच सकते हैं तो खींच लें।

लोकतंत्र की बात करें तो अविश्वास प्रस्ताव संसदीय कार्यवाही में विपक्ष का एक महत्वपूर्ण औजार है, जिसका इस्तेमाल किसी खास मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए किया जाता है। यह कोई नंबर गेम नहीं है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अब तक तमाम अविश्वास प्रस्ताव गिर जाने की पूरी पूरी संभावनाओं के बीच और उसके बावजूद लाए गए हैं। संदर्भ के अनुसार पहला अविश्वास प्रस्ताव प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार के खिलाफ 1963 में चीन के हमले के बाद लाया गया था। नेहरू जी के पास तब प्रचंड बहुमत था। इसके बावजूद अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और उस सरकार की तीखी आलोचना की गई।

इसमें संदेह नहीं कि संसद में दिए गए भाषणों का जनता पर काफी असर होता है, लेकिन इस असर का आकलन अक्सर सब्जेक्टिव ही होता है। इसलिए किसी अविश्वास प्रस्ताव के विश्लेषण और मूल्यांकन का बेहतर आधार यह है कि इसमें संसदीय परंपराओं का कितना पालन हुआ और जन-प्रतिनिधि जरूरी मुद्दे उठाने में किस हद तक सफल रहे। मुद्दों पर कितने लोग कितना बोले। भारत की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि इस दौरान सत्तापक्ष और विपक्ष का एक दूसरे के प्रति कैसा बर्ताव रहा।

एक बात तो साफ है कि अभी जो अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था, उसमें संसदीय परंपराओं की झलक भी देखने को नहीं मिली। लेकिन गौर करें तो इसने आने वाले चुनावी संघर्ष की रूपरेखा अवश्य तय कर दी है। इसने यह भी अंदाजा दे दिया कि यह संघर्ष कितना तीखा होगा। प्रश्न उठता है कि क्या विपक्ष मणिपुर के मुद्दे पर वाकई जिस तरह की बहस कराना चाहता था, उसमें सफल हुआ? क्या उसका उद्देश्य केवल इतना था कि प्रधानमंत्री की उपस्थिति में चर्चा हो? सतही तौर पर देखें तो वह इस उद्देश्य में कामयाब रहा कि प्रधानमंत्री सदन में आएं। लेकिन क्या इससे मणिपुर की समस्याओं पर सही फोकस हो पाया? हम पाते हैं कि जिस मुद्दे पर फोकस के लिए कांग्रेस नेता गौरव गोगोई प्रस्ताव लेकर आए थे, उस पर सदन जरूरी तवज्जो नहीं दे पाया। और तो और सत्तापक्ष की तरफ से तो उस क्षेत्र के सांसद भी इस पर नहीं बोले या उन्हें बोलने का मौका ही नहीं दिया गया।

अगर हम सदन की कार्यवाही का गंभीरता से विश्लेषण करें तो कहीं न कहीं 2024 के चुनावी संघर्ष के मुद्दे साफ होते दिखाई देते हैं। यह लगभग तय हो गया है कि आने वाले लोकसभा चुनावों में सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद महत्वपूर्ण मुद्दा होगा। कर्नाटक चुनावों के बाद कई राजनीतिक विश्लेषक मानने लगे थे कि बीजेपी हिंदुत्व के मुद्दे में नरमी लाएगी क्योंकि वहां हिंदू धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल से जिस चमत्कार की उम्मीद बीजेपी ने की थी, वह पूरी नहीं हुई। इसके उलट कमजोर तबकों, बेरोजगारों आदि के लिए कल्याणकारी योजनाओं का कांग्रेस का फॉर्मूला काम कर गया। लेकिन प्रस्ताव पर बीजेपी नेताओं के भाषणों से यही लगा कि आने वाले लोकसभा चुनावों में पार्टी हिंदुत्व के मुद्दे को ही केंद्र में रखेगी। जोर राष्ट्रवाद पर भी रहेगा। क्योंकि कहीं न कहीं वह बाकी मुद्दों में पिछड़ती ही दिख रही है।

शायद यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में यह साबित करने की कोशिश की कि कांग्रेस राष्ट्रीय हितों के खिलाफ काम करने वाली पार्टी है। उन्होंने यह भी कहा कि यह देश के टुकड़े करने वाली पार्टी है। देखा जाए तो उन्होंने आरएसएस और हिंदू महासभा की अखंड भारत की परंपरागत लाइन को जिंदा करने की कोशिश ही की है। राहुल गांधी के भाषण के अंतिम हिस्सों पर गौर करें तो पता चलता है कि कांग्रेस इस बारे में आक्रामक रवैया अपनाने का मन बना चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी को भारत माता का हत्यारा और देशद्रोही बताने वाला उनका बयान इसी ओर संकेत करता है। अधीर रंजन चौधरी ने भी आजादी के आंदोलन के इतिहास के उल्लेख के माध्यम से यही लाइन पेश की। अब यह जनता को सोचना होगा कि उसे केवल हिंदुत्व की बात करना है, या फिर डगमगाती अर्थव्यवस्था, बढ़ते कर्ज, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर ध्यान देना है? फिलहाल आने वाले कुछ राज्यों के चुनावों को आम चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है, कर्नाटक के बाद कुछ मुद्दों में इनके परिणाम भी परिवर्तन कर सकते हैं। फिर भी, यह तय है कि सत्तापक्ष अपने मूल मुद्दों को ही अगले चुनाव में लेकर जाने वाला है, उसके तेवर देख लें या फिर केंद्र और भाजपा शासित राज्यों में जो चल रहा है, उसका विश्लेषण कर लें। हां, निर्णायक जनता रहेगी, यदि भ्रमित होती रही, तो हमारी गलती।

– संजय सक्सेना

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