नई दिल्ली । इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर बोइंग 747 एयरक्राफ्ट शुक्रवार को उतरा। इस विमान से मेक्सिको में अवैध तरीके से रह रहे 311 भारतीय प्रवासियों को भारत वापस लाया गया है। पिछले 6 महीने से ये सभी लोग मेक्सिको के कैंप में अमानवीय जीवन जी रहे थे। 
उन्होंने बताया कि इन्हें मेक्सिको स्थित कैंप में सिर्फ नंबर से पुकारा जाता था। किसी भी सूचना या काम के लिए गार्ड नंबर-308 या 201... कहकर पुकारता था। उन्होंने कहा महीनों बाद उन्हें एयरपोर्ट पर लेने आए रिश्तेदारों ने जब नाम से पुकारा तब हमने महसूस किया कि हम भी  दूसरों की तरह सामान्य लोग हैं।
एजेंट को लाखों दिए ताकि अमेरिका में नौकरी मिल जाए 24 वर्षीय राहुल करनाल के हैं और भारत वापस लौटकर फिर से नई उम्मीद से भरे नजर आए। राहुल ने कहा तापाचुला के यूएऩ इमिग्रेंट कैंप में रहना बहुत मुश्किल अनुभव था। उन्होंने अपना हाथ दिखाते हुए बताया कि अमानवीय परिस्थिति में रहने के कारण उनके हाथ पर एग्जिमा हो गया। उन्होंने बताया कि कैंप में सिर्फ चावल और घुन लगे बीन्स ही खाने को मिलते थे। राहुल ने बीएससी तक पढ़ाई की है। उसने अमेरिका में नौकरी के लिए एजेंट को लाखों रुपए दिए थे। अमेरिका जाकर नौकरी का सपना तो पूरा नहीं हुआ, लेकिन उसे कैंप में  महीनों बिताने पर जरूर मजबूर होना पड़ा।
310 पुरुष और एक महिला को मेक्सिको से डिपॉर्ट किया गया। ये सभी किसी न किसी एजेंट के ही जरिए वहां तक पहुंचे थे और मेक्सिको के ऑक्सा, बाजा कैलिफॉर्निया, वेराक्रूज, चिपास, सोनारा, मेक्सिको सिटी में रह रहे थे। अवैध भारतीय प्रवासियों में से ज्यादातर पंजाब के रहनेवाले हैं। इसके साथ ही कुछ हरियाणा और गुजरात के भी हैं और कुछेक जम्मू-कश्मीर के भी रहनेवाले हैं। 
राहुल ने बताया कैंप में हमें जानवरों या खुंखार अपराधियों की तरह रखा जाता था। हमें खाने के लिए चावल के साथ रेड बींस ही मिलते थे। दिल्ली वापस लौटने पर राहुल और दूसरे भारतीयों ने केंद्र सरकार का शुक्रिया अदा किया। सुरक्षित देश लौटने के बाद इन भारतीयों ने कहा कि हमें उम्मीद नहीं थी कि हमारी रिहाई के लिए केंद्र सरकार इतनी तत्परता दिखाएगी। राहुल ने बताया हमारे पास न तो पासपोर्ट था और न ही जरूरी दस्तावेज, लेकिन इसके बाद भी केंद्र सरकार ने हमारी सुरक्षित वतन वापसी के लिए काफी प्रयास किए। रवि यादव ने बताया कि कैंप में हमारे साथ जानवरों जैसा सुलूक किया जाता था। हमें 3फुटx3 फुट की जगह रहने के लिए दी गई थी। रवि ने बताया कि वहां जिंदा रहने का संघर्ष काफी कठिन था और हमें अफ्रीका, सीरिया और मध्य पूर्व देशों से आए प्रवासियों के साथ जगह के लिए संघर्ष करना पड़ा।